
मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने इसके लिए छह सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। विधि और विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार यह समिति यूसीसी का मसौदा तैयार करेगी। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि छह महीने के भीतर ड्राफ्ट तैयार किया जाए। सरकार का लक्ष्य इस साल दिवाली तक इस कानून को लागू करना है। इस फैसले के बाद राज्य में कानूनी और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और इसे एक बड़े सुधार के रूप में देखा जा रहा है।
कौन-कौन हैं समिति में शामिल और क्या होगी जिम्मेदारी
इस महत्वपूर्ण समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रसाद देसाई करेंगी। उनके साथ सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और समाजसेवी बुधपाल सिंह को सदस्य बनाया गया है। समिति को 60 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट और यूसीसी का ड्राफ्ट सरकार को सौंपना होगा। यह टीम राज्य के विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का गहन अध्ययन करेगी। इसमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़े कानूनों की समीक्षा शामिल होगी। साथ ही समिति यह भी देखेगी कि प्रस्तावित कानून लागू करने में कोई कानूनी या प्रशासनिक बाधा न आए।

दूसरे राज्यों के मॉडल और जनता की राय पर होगा फोकस
समिति उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों के यूसीसी मॉडल का भी अध्ययन करेगी। इसके अलावा आम जनता, धार्मिक संगठनों और विधि विशेषज्ञों से सुझाव लिए जाएंगे ताकि कानून व्यापक और संतुलित बन सके। सरकार चाहती है कि यह कानून सभी वर्गों के लिए समान और न्यायसंगत हो। खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी। समिति सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी सिफारिशें देगी ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद या असंतुलन न हो।
महिलाओं और समाज के लिए क्या होगा असर
सरकार का मानना है कि यूसीसी लागू होने से समाज में समानता और न्याय की भावना मजबूत होगी। खासतौर पर महिलाओं को इससे अधिक अधिकार और सुरक्षा मिल सकती है। वर्तमान में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जिससे कई बार असमानता की स्थिति पैदा होती है। यूसीसी के जरिए इन सभी कानूनों को एक समान ढांचे में लाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इस मुद्दे पर सामाजिक और राजनीतिक बहस भी तेज होने की संभावना है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि समिति की सिफारिशें क्या होती हैं और सरकार इसे किस रूप में लागू करती है।