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सत्य निकेतन हादसे के बाद डूसू चुनाव में हॉस्टल और छात्र सुरक्षा का मुद्दा बना सबसे बड़ी चुनावी चुनौती

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव से पहले सत्य निकेतन इमारत हादसे ने छात्रों की सुरक्षा और आवास व्यवस्था को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है। हॉस्टल की कमी, निजी पीजी की सुरक्षा और प्रशासन की जवाबदेही अब ऐसे सवाल हैं, जिनसे छात्र संगठन बच नहीं सकते।

सत्य निकेतन हादसे ने बदला चुनावी एजेंडा

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव की वोटिंग में अब कुछ ही दिन बाकी हैं। इसी बीच सत्य निकेतन में इमारत ढहने की घटना ने कैंपस की छात्र राजनीति को एक अहम मुद्दा दे दिया है। हादसे में छात्रों समेत लोगों की जान जाने के बाद सुरक्षित आवास और रहने की बेहतर व्यवस्था को लेकर सवाल तेज हो गए हैं।

डीयू में पढ़ने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में छात्र दिल्ली आते हैं। इनमें से हर छात्र को विश्वविद्यालय का हॉस्टल नहीं मिल पाता। ऐसे में कई छात्र निजी पीजी या किराए के कमरों में रहने को मजबूर होते हैं।

हॉस्टल की कमी से बढ़ी निजी पीजी पर निर्भरता

हॉस्टल और सुरक्षित पीजी की मांग डीयू छात्र राजनीति में लंबे समय से उठती रही है। लेकिन सत्य निकेतन की घटना ने इसे महज सुविधा का मुद्दा न रखकर सीधे छात्रों की सुरक्षा से जोड़ दिया है।

छात्रों के बीच अब यह सवाल है कि निजी पीजी और किराए के आवासों में सुरक्षा मानकों की निगरानी कौन करता है। वहीं, डीयू प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र बाहर से आते हैं, तो उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित आवास की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी।

सत्य निकेतन हादसे के बाद डूसू चुनाव में हॉस्टल और छात्र सुरक्षा का मुद्दा बना सबसे बड़ी चुनावी चुनौती

अब सिर्फ मुद्दा उठाना काफी नहीं

हॉस्टल और यू-स्पेशल बसें डूसू चुनाव के पुराने मुद्दों में शामिल रही हैं। इनकी चर्चा दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भी होती रही है और BJP, कांग्रेस तथा AAP समेत अलग-अलग दलों ने अपने राजनीतिक एजेंडे में इन्हें जगह दी है।

इसके बावजूद छात्रों के सामने आज भी वही सवाल मौजूद हैं। पिछले वर्षों में कितने नए हॉस्टल बने? उनमें कितने छात्रों को वास्तव में जगह मिली? निजी पीजी और हॉस्टल की सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी किसकी जिम्मेदारी है? इन सवालों के जवाब अब चुनावी वादों से आगे जाकर मांगे जा सकते हैं।

ABVP ने उठाई प्रशासन की जवाबदेही

सत्य निकेतन हादसे के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रशासन की कथित लापरवाही को लेकर आवाज उठानी शुरू कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र, दिल्ली और एमसीडी में BJP की सरकार होने के बावजूद ABVP प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है।

संगठन छात्रों के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह हादसे और सुरक्षा से जुड़े सवालों को पार्टी राजनीति से अलग रखते हुए छात्रों के हित से जोड़कर देख रहा है।

NSUI समेत दूसरे संगठन भी सक्रिय

दूसरी ओर कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI समेत अन्य छात्र संगठनों ने भी इस मुद्दे पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। ऐसे में डूसू चुनाव की बहस अब केवल कैंपस की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह गई है।

हॉस्टल, पीजी, सुरक्षित आवास और कैंपस के बाहर छात्रों की सुरक्षा जैसे सवाल चुनावी मुद्दों का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में ABVP और NSUI के बीच इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है।

डूसू से निकले कई बड़े राजनीतिक चेहरे

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का प्रभाव सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं रहा। यहां से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति में बड़े नाम बने। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन और विजय गोयल, अलका लांबा और रागिनी नायक जैसे नेताओं की राजनीतिक पहचान डूसू से भी जुड़ी रही है।

दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी डीयू की छात्र राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। ऐसे में डूसू चुनाव केवल विश्वविद्यालय का चुनाव नहीं माना जाता, बल्कि इसे भविष्य की राजनीति के लिए नेतृत्व तैयार करने वाले मंच के तौर पर भी देखा जाता है।

इस बार जवाबदेही की परीक्षा

सत्य निकेतन हादसे ने डीयू की छात्र राजनीति के सामने एक बड़ी चुनौती रख दी है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन सा संगठन हॉस्टल, पीजी या यू-स्पेशल बस का मुद्दा कितनी जोर से उठाता है। असली सवाल यह है कि कौन इन मुद्दों को ठोस समाधान तक पहुंचाने का रोडमैप देता है।

छात्र आंदोलन कई बार बड़े बदलावों की वजह बने हैं। ऐसे में इस चुनाव में सुरक्षित आवास का सवाल कितना प्रभावी होता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि सत्य निकेतन की घटना ने छात्रों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि चुनावी वादों के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर कौन उठाएगा।

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