
अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे कुछ प्रदर्शनकारियों और Gen Z की रील्स की कड़ी आलोचना की। उन्होंने भाषा, व्यवहार और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।
सोशल मीडिया पोस्ट में जताई नाराजगी
कंगना रनौत ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़ी कुछ रील्स और वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें “उल्टी लाने वाला”, “अशिष्ट” और “परेशान करने वाला” बताया। उन्होंने कहा कि इन वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा और व्यवहार उन्हें बेहद आपत्तिजनक लगा। पोस्ट में उन्होंने यह भी लिखा कि इन रील्स को देखने के बाद उन्हें “डिजिटल डिटॉक्स” की जरूरत महसूस हुई।
भारत की संस्कृति का किया जिक्र
अपने पोस्ट में कंगना ने भारत को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और शालीन परंपराओं वाला देश बताया। उनका कहना था कि भारतीय समाज की पहचान उसकी सांस्कृतिक परिपक्वता और गरिमा से होती है। उन्होंने कुछ प्रदर्शनकारियों के व्यवहार की आलोचना करते हुए कहा कि यह देश की सांस्कृतिक छवि के अनुरूप नहीं है।

‘कॉकरोच’ टिप्पणी पर भी दी प्रतिक्रिया
कंगना ने उन प्रदर्शनकारियों का भी जिक्र किया, जो कथित तौर पर व्यंग्यात्मक रूप से खुद को “कॉकरोच” कह रहे थे। उन्होंने लिखा कि इस तरह की भाषा और प्रस्तुति दुनिया के सामने भारत की सकारात्मक छवि पेश नहीं करती। यह टिप्पणी उनके व्यक्तिगत विचार हैं, जिन पर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
युवा महिलाओं पर भी व्यक्त किए विचार
एक अन्य पोस्ट में कंगना रनौत ने कुछ युवा महिलाओं के व्यवहार पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वास्तविक आत्मनिर्भरता केवल स्वतंत्र जीवनशैली अपनाने से नहीं, बल्कि अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने और मेहनत के दम पर आगे बढ़ने से आती है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
कंगना रनौत के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग उनके विचारों का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कई यूजर्स उनकी टिप्पणियों से असहमति जता रहे हैं। फिलहाल इस मुद्दे पर प्रदर्शनकारियों या संबंधित पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कंगना रनौत की सोशल मीडिया पोस्ट ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक मूल्यों पर बहस को हवा दे दी है। ऐसे मामलों में अलग-अलग विचार सामने आना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में संतुलित और सम्मानजनक संवाद लोकतांत्रिक समाज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
