
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी ने दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया है। संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर चलाया जा रहा यह अभियान सामाजिक समरसता के संदेश के साथ-साथ आगामी चुनावी रणनीति का भी अहम हिस्सा माना जा रहा है।
29 जुलाई से शुरू होगा समरसता संकल्प अभियान
भारतीय जनता पार्टी 29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक ‘श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान’ चलाएगी। पार्टी का उद्देश्य संत रविदास के समानता, सामाजिक समरसता, सेवा और भाईचारे के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना तथा दलित एवं वंचित समाज के साथ जनसंपर्क को मजबूत करना है।
अभियान की शुरुआत वाराणसी से समरसता दीप अभियान के साथ होगी। इसके अलावा कलश वंदन अभियान के तहत संत रविदास की जन्मस्थली सीर गोवर्धनपुर की पवित्र मिट्टी गांवों और बस्तियों तक पहुंचाई जाएगी।

क्या होंगे अभियान के प्रमुख कार्यक्रम?
बीजेपी ने इस अभियान के तहत कई चरणों में कार्यक्रम तय किए हैं।
- 25–27 जुलाई 2026: सभी जिलों में प्रशिक्षण कार्यशालाएं।
- 29 जुलाई: वाराणसी से समरसता दीप अभियान की शुरुआत।
- 29 जुलाई–10 सितंबर: कलश वंदन अभियान।
- 29 जुलाई–31 अगस्त: संत संपर्क अभियान, जिसमें संतों और धार्मिक नेताओं से संवाद होगा।
- 5 अक्टूबर–5 नवंबर: गुरु रविदास समरसता यात्रा, जो पंजाब के जालंधर से शुरू होकर वाराणसी में समाप्त होगी।
दलित वोट बैंक क्यों है अहम?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राज्य में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है और विधानसभा की 403 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित मतदाता केवल आरक्षित सीटों ही नहीं, बल्कि 150 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनावी परिणाम प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
2017 से 2024 तक कैसे बदले चुनावी समीकरण?
2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 39.67 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 312 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। वहीं 2022 में पार्टी ने 41.29 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 255 सीटें हासिल कीं।
CSDS-लोकनीति के चुनाव बाद के सर्वे बताते हैं कि 2017 और 2022 के बीच गैर-जाटव दलितों में बीजेपी का समर्थन बढ़ा, जबकि बहुजन समाज पार्टी का आधार कमजोर हुआ। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा इंडिया गठबंधन की ओर जाता दिखाई दिया, जबकि जाटव मतदाताओं में बसपा अब भी प्रमुख दावेदार रही। इन बदलते रुझानों को देखते हुए बीजेपी अब दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
84 आरक्षित सीटों पर क्यों टिकी है नजर?
उत्तर प्रदेश की 84 आरक्षित विधानसभा सीटों में फिलहाल 69 सीटों पर बीजेपी और उसके सहयोगी दलों का कब्जा है। समाजवादी पार्टी के पास 10 सीटें हैं, जबकि अन्य सीटें विभिन्न दलों और एक निर्दलीय विधायक के पास हैं। इन सीटों पर प्रदर्शन आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी का ‘श्री गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान’ सामाजिक संदेश और राजनीतिक रणनीति, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं विपक्ष भी दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिशों में जुटा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित वोट बैंक का रुझान किस राजनीतिक दल के पक्ष में जाता है और इसका चुनावी परिणामों पर कितना असर पड़ता है।
