
पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल चुनाव से पहले प्रचार में एक अनोखा नजारा देखने को मिला। छात्रों ने गोरिल्ला की ड्रेस पहनकर कैंपस में प्रचार किया। यह सिर्फ ध्यान खींचने का तरीका नहीं था, बल्कि हॉस्टलों में बढ़ते बंदरों के आतंक को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश भी थी।
31 अगस्त को होगा छात्रसंघ चुनाव
पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस में स्टूडेंट्स काउंसिल चुनाव 31 अगस्त को होना है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, छात्र संगठनों ने प्रचार तेज कर दिया है। इसी बीच ISO ने अपने वाइस प्रेसिडेंट पद के प्रत्याशी विपुल भारती के समर्थन में यह अनोखा अभियान चलाया।
गर्ल्स हॉस्टल में प्रचार के दौरान छात्र बैनर और पोस्टर लेकर पहुंचे। उनके साथ गोरिल्ला की ड्रेस पहने एक युवक भी था, जिसने पूरे अभियान को अलग पहचान दे दी।
बंदरों की समस्या को बनाया चुनावी मुद्दा
ISO के मुताबिक, गोरिल्ला कैंपेन का मकसद कैंपस में बंदरों की बढ़ती समस्या की ओर ध्यान खींचना था। छात्रों का दावा है कि बंदर हॉस्टलों में घुसकर सामान उठा ले जाते हैं और कई बार छात्रों के लिए परेशानी तथा सुरक्षा का कारण भी बनते हैं।

विपुल भारती ने दावा किया कि कैंपस में करीब 800 से 1,000 बंदर हैं। उनका कहना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान जरूरी है।
प्रशासन से स्थायी समाधान की मांग
छात्रों का कहना है कि बंदरों को लेकर केवल अस्थायी इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं। हॉस्टलों में रहने वाले विद्यार्थियों को रोजमर्रा की परेशानियों से बचाने के लिए प्रशासन को ठोस योजना बनानी चाहिए।
इसी मांग को चुनाव प्रचार से जोड़कर छात्रों ने गोरिल्ला ड्रेस का इस्तेमाल किया। उनका प्रयास था कि सामान्य राजनीतिक नारों से अलग यह मुद्दा सीधे छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन की नजर में आए।
महिला मतदाता होंगी निर्णायक
इस बार चुनाव में महिला मतदाताओं की भूमिका खास हो सकती है। यूनिवर्सिटी के अनुसार कुल 16,468 विद्यार्थी मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं। इनमें 7,467 पुरुष, करीब 9,000 महिलाएं और एक ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल है।
महिला मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं के आधे से अधिक है। ऐसे में गर्ल्स हॉस्टल और वहां से जुड़े मुद्दे चुनावी प्रचार में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
पिछले चुनाव से बढ़े मतदाता
यूनिवर्सिटी के मुताबिक इस बार पिछले साल की तुलना में 344 मतदाता बढ़े हैं। पिछले चुनाव में 9,535 विद्यार्थियों ने मतदान किया था। अब 31 अगस्त को होने वाले चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदान प्रतिशत कितना रहता है और छात्रों के स्थानीय मुद्दे उम्मीदवारों के प्रदर्शन को कितना प्रभावित करते हैं।
फिलहाल गोरिल्ला कैंपेन ने यह जरूर दिखा दिया है कि कैंपस चुनाव में जीत की लड़ाई केवल बड़े नारों से नहीं, बल्कि ऐसे मुद्दों से भी लड़ी जा रही है जो छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़े हैं।