
बिहार में रोजगार और पलायन का सवाल एक बार फिर आमने-सामने खड़ा है। सरकार नौकरी देने के अपने दावे पर आगे बढ़ रही है, लेकिन पटना के रोजगार मेले में मिली नौकरियों ने युवाओं की दूसरी मजबूरी उजागर कर दी। रोजगार मिला, मगर अपने राज्य में नहीं।
एक करोड़ रोजगार का वादा, रोजगार मेले में बाहर की नौकरी
बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव 2025 से पहले 2025 से 2030 के बीच एक करोड़ नौकरी और रोजगार देने का वादा किया था। सरकार बनने के बाद इस दिशा में काम किए जाने की बात कही गई। इसी क्रम में 8 अगस्त को पटना के नियोजन भवन में रोजगार मेला आयोजित किया गया।
15 से 25 हजार रुपये तक वेतन
रोजगार मेले में गुजरात और दिल्ली की कंपनियों ने युवाओं का चयन किया। सिक्योरिटी गार्ड और ऑपरेटर के पदों के लिए 15 हजार से 25 हजार रुपये तक वेतन बताया गया। लेकिन इन नौकरियों की सबसे बड़ी शर्त यही रही कि चयनित युवाओं को बिहार से बाहर जाना होगा।
ऑपरेटर की नौकरी के लिए गुजरात और सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा।

‘बिहार में 15 हजार की नौकरी भी नहीं’
रोजगार मेले में पहुंचे युवाओं की बातों में बेरोजगारी की मजबूरी साफ दिखाई दी। एक 42 वर्षीय डिप्लोमा धारक ने बताया कि लंबे समय से नौकरी की तलाश है। उनका कहना था कि अगर गुजरात में 25 हजार रुपये तक मिलते हैं तो वह बाहर जाने के लिए तैयार हैं, क्योंकि पटना में 15 हजार रुपये की नौकरी मिलना भी मुश्किल है।
कई अन्य युवाओं ने भी कहा कि परिवार चलाने के लिए नौकरी जरूरी है। ऐसे में नौकरी अपने शहर में मिले या दूसरे राज्य में, उन्हें अवसर स्वीकार करना ही पड़ेगा।
रोजगार बनाम पलायन की पुरानी समस्या
बिहार में रोजगार का मुद्दा केवल नौकरी मिलने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि रोजगार कहां पैदा हो रहा है। यदि युवाओं को 15-20 हजार रुपये की नौकरी के लिए दिल्ली, गुजरात या दूसरे राज्यों का रुख करना पड़े, तो पलायन की समस्या बनी रहती है।
विपक्ष लंबे समय से इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाता रहा है। वहीं सरकार रोजगार और नियुक्तियों की दिशा में लगातार काम करने का दावा करती है।
युवाओं के सामने मजबूरी का सवाल
रोजगार मेले की तस्वीर बिहार के युवाओं की वास्तविक स्थिति का एक पहलू सामने रखती है। युवा काम करना चाहते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर पर्याप्त अवसर नहीं मिलने के कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ता है। वेतन भले ही बहुत बड़ा न हो, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियां उन्हें जोखिम उठाने के लिए मजबूर करती हैं।
असली चुनौती रोजगार की गुणवत्ता और स्थानीय अवसर
सरकार के सामने अब केवल रोजगार के आंकड़े बढ़ाने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि बिहार में ऐसे कितने स्थायी और सम्मानजनक रोजगार पैदा होते हैं, जिनके लिए युवाओं को अपना घर और परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों में न जाना पड़े। जब तक स्थानीय उद्योग, निवेश और निजी क्षेत्र में पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ेंगे, तब तक रोजगार और पलायन की बहस अधूरी ही रहेगी।