हत्या की जांच के दौरान परिजनों को थाने में रोकने का आरोप, हाई कोर्ट ने पुलिस को लगाई कड़ी फटकार

देवरिया के गौरी बाजार थाने में आरोपी के परिजनों और रिश्तेदारों को कई दिनों तक कथित तौर पर हिरासत में रखे जाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने चार याचियों को कुल 65 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह रकम संबंधित थानाध्यक्ष के वेतन से वसूली जाएगी।
तीन महिलाओं समेत चार लोगों ने लगाई थी गुहार
मामला महेंद्र गौड़ की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने सुनवाई की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि तीन महिलाओं समेत चार लोगों को 13 से 24 अप्रैल के बीच उनकी इच्छा के खिलाफ गौरी बाजार थाने में रखा गया।
याचियों का दावा था कि कुछ लोगों को करीब दस दिनों तक थाने में बैठाए रखा गया और उन्हें स्वतंत्र रूप से जाने की अनुमति नहीं दी गई।
हत्या के बाद शुरू हुई थी पुलिस कार्रवाई
यह पूरा मामला बैतालपुर स्थित एक ढाबे पर 12 अप्रैल की रात हुई पप्पू यादव की हत्या के बाद शुरू हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। पुलिस ने हत्या के मामले में कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था और आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

परिजनों के मुताबिक, इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के परिवार और रिश्तेदारों को पूछताछ के नाम पर थाने बुलाया। इसी कार्रवाई में उन्हें कथित तौर पर कई दिनों तक थाने में रोके रखा गया।
CCTV खराब होने की दलील पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने थाने के CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग और संबंधित अवधि की फुटेज के बारे में जानकारी मांगी। पुलिस की ओर से बताया गया कि उस समय CCTV सिस्टम खराब था।
अदालत ने इस जवाब को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पुलिस थानों में CCTV कैमरों का 24 घंटे चालू रहना और रिकॉर्डिंग का बैकअप सुरक्षित रखना जरूरी है।
पुलिस अधीक्षक और थानाध्यक्ष की भूमिका पर नाराजगी
खंडपीठ ने CCTV और उसके बैकअप की व्यवस्था नहीं होने को गंभीर लापरवाही माना। अदालत ने पुलिस अधीक्षक और थानाध्यक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियां कीं।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि थाने में हिरासत से जुड़े मामलों में CCTV रिकॉर्डिंग पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता का अहम सबूत मानी जाती है।
चार याचियों को मिलेगा 65 हजार मुआवजा
अदालत के आदेश के अनुसार अर्चना, नीरू, नंदनी और महेंद्र समेत चार याचियों को कुल 65 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि यह राशि संबंधित थानाध्यक्ष के वेतन से वसूली जाएगी।
इस आदेश के जरिए अदालत ने यह संदेश भी दिया है कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से मनमाने तरीके से समझौता नहीं किया जा सकता।
पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही का सवाल
देवरिया का यह मामला केवल एक थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह पुलिस जांच के दौरान नागरिकों के अधिकार, हिरासत की प्रक्रिया और CCTV जैसी निगरानी व्यवस्था की अहमियत पर भी सवाल खड़ा करता है। अदालत की सख्ती बताती है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों से भी जवाबदेही की उम्मीद उतनी ही जरूरी है जितनी किसी आरोपी से कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की।
