‘बटोहिया’: 1911 में लिखा भोजपुरी गीत, जिसमें बसता है पूरा भारत; सात देशों तक पहुंची इसकी गूंज

भोजपुरी का ‘बटोहिया’ सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता, प्रकृति और देशभक्ति की भावनाओं को समेटे एक ऐतिहासिक रचना मानी जाती है। 1911 में बाबू रघुबीर नारायण द्वारा रचा गया यह गीत बिहार से निकलकर गिरमिटिया भारतीयों के जरिए दुनिया के कई देशों तक पहुंचा।
1911 में रचा गया था ‘बटोहिया’
भोजपुरी के प्रसिद्ध गीत ‘बटोहिया’ की रचना वर्ष 1911 में सारण, बिहार के बाबू रघुबीर नारायण ने की थी। इसे ‘सुंदर सुभूमि भैया’ नाम से भी जाना जाता है।
लोकपरंपरा में यह बात प्रचलित है कि रघुबीर नारायण मुख्य रूप से अंग्रेजी में लिखते थे। कहा जाता है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें भोजपुरी में लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने इस गीत की रचना की।
हालांकि, इस प्रसंग से जुड़े विवरणों के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं, इसलिए इसे लोकप्रचलित संदर्भ के रूप में देखना उचित है।
‘बटोहिया’ का मतलब क्या है?
भोजपुरी में ‘बटोहिया’ का अर्थ यात्री या राहगीर होता है। गीत की कल्पना में एक यात्री के माध्यम से भारत की सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत का वर्णन किया गया है।
गीत का संबंध भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और विदेशों में रहने वाले गिरमिटिया भारतीयों की स्मृतियों से भी जोड़ा जाता है। उस दौर में बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर दूसरे देशों में गए थे। उनके लिए भारत की याद और अपनी मातृभूमि से जुड़ाव ऐसे लोकगीतों के जरिए जीवित रहा।

बिहार से आगे पूरे भारत का वर्णन
‘बटोहिया’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल बिहार की सुंदरता का वर्णन नहीं है, बल्कि भारत को एक व्यापक सांस्कृतिक इकाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
‘सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा…’ जैसी पंक्तियों में भारत की प्राकृतिक सुंदरता और मातृभूमि के प्रति लगाव दिखाई देता है। गीत में हिमालय और समुद्र का उल्लेख करते हुए देश की भौगोलिक विशेषताओं को भी काव्यात्मक रूप दिया गया है।
इसी वजह से ‘बटोहिया’ को भोजपुरी लोकसाहित्य में देशभक्ति और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी महत्वपूर्ण रचनाओं में गिना जाता है।
राम, सीता और कृष्ण का भी जिक्र
गीत में भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। इसमें वेदों, ऋषि-मुनियों और भारतीय धार्मिक आख्यानों की चर्चा के साथ भगवान राम, माता सीता और भगवान कृष्ण से जुड़ी स्मृतियां भी दिखाई देती हैं।
इस तरह गीत केवल प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं करता, बल्कि भारत की सभ्यता, आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को भी एक साथ सामने रखता है।
कभी बिहार में राष्ट्रगीत जैसा था दर्जा
‘बटोहिया’ ने बिहार में लंबे समय तक लोकप्रिय लोकगीत के रूप में अपनी अलग पहचान बनाए रखी। इसकी देशभक्ति की भावना के कारण इसे कई जगहों पर बिहार के ‘राष्ट्रगीत’ जैसे सम्मान से भी याद किया गया।
समय के साथ आधुनिक मनोरंजन और बदलते संगीत माध्यमों के बीच इस गीत की लोकप्रियता कम हुई, लेकिन भोजपुरी साहित्य और लोकसंस्कृति में इसकी पहचान आज भी बनी हुई है।
सात देशों तक पहुंची ‘बटोहिया’ की आवाज
‘बटोहिया’ की पहचान सिर्फ भोजपुरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। गिरमिटिया भारतीयों के ऐतिहासिक प्रवास के कारण भोजपुरी भाषा और संस्कृति मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना और त्रिनिदाद-टोबैगो जैसे देशों तक पहुंची।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार भारत समेत सात देशों के 11 गायकों ने मिलकर इस गीत को प्रस्तुत किया है। इन देशों में भारत, सूरीनाम, नीदरलैंड, मॉरीशस, त्रिनिदाद-टोबैगो, गुयाना और फिजी शामिल हैं।
यही वजह है कि ‘बटोहिया’ को भोजपुरी लोकगीत के साथ-साथ प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक स्मृति से जोड़कर भी देखा जाता है।
लोकगीतों में दिखता है समाज का इतिहास
लोकगीतों की ताकत यही है कि वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते। इनमें किसी दौर का सामाजिक जीवन, भाषा, संस्कृति, संघर्ष और लोगों की भावनाएं भी दर्ज होती हैं।
‘बटोहिया’ इसका एक उदाहरण है। एक सदी से ज्यादा पुरानी यह रचना आज भी भारत की प्रकृति, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव की कहानी सुनाती है।
