चंडीगढ़ बॉर्डर पर फिर जुटे पंजाब के किसान, MSP की कानूनी गारंटी समेत उठाईं कई मांगें

पंजाब में किसानों का आंदोलन एक बार फिर तेज हो गया है। चंडीगढ़ बॉर्डर पर जुटे किसान सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी नहीं, बल्कि पानी, कर्ज और फसल बीमा जैसे लंबे समय से लंबित मुद्दों पर भी सरकार से ठोस फैसला चाहते हैं।
एक सप्ताह के धरने से बढ़ी हलचल
पंजाब के किसान मंगलवार को बड़ी संख्या में चंडीगढ़ बॉर्डर पहुंचे। संयुक्त किसान मोर्चा यानी SKM की ओर से 1 से 7 सितंबर तक सप्ताहभर का धरना आयोजित किया जा रहा है। किसानों ने एयरपोर्ट रोड के पास अपना प्रदर्शन शुरू किया है।
प्रदर्शन को देखते हुए चंडीगढ़ पुलिस ने सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं। फिलहाल किसानों का आंदोलन शांतिपूर्ण बताया जा रहा है।
22 फसलों पर MSP की कानूनी गारंटी
किसानों की सबसे प्रमुख मांग 22 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी है। किसान संगठनों का कहना है कि सरकार द्वारा MSP घोषित करना पर्याप्त नहीं है। किसानों को उनकी उपज पर तय मूल्य मिलने की कानूनी सुरक्षा भी जरूरी है।
BKU लखोवाल के वरिष्ठ नेता हरिंदर सिंह लखोवाल के मुताबिक, किसान संगठन लंबे समय से इस मांग को उठा रहे हैं और कई स्तरों पर अधिकारियों को ज्ञापन भी दे चुके हैं।

पंजाब के पानी का मुद्दा भी केंद्र में
किसान नेताओं ने पंजाब के जल अधिकारों को भी आंदोलन का अहम मुद्दा बनाया है। लखोवाल ने पंजाब सरकार से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है।
उनका कहना है कि पानी से जुड़े पुराने समझौतों को लेकर सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। किसान संगठनों का दावा है कि पहले भी इन मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन फैसलों को जमीन पर लागू नहीं किया गया।
कर्ज और फसल बीमा पर भी जोर
किसानों ने कर्ज राहत की मांग को भी आंदोलन में शामिल किया है। उनका तर्क है कि अगर बड़ी कंपनियों के कर्ज माफ किए जा सकते हैं तो किसानों को भी आर्थिक संकट से राहत मिलनी चाहिए।
इसके साथ ही किसान एक प्रभावी और बेहतर फसल बीमा योजना की मांग कर रहे हैं, ताकि प्राकृतिक आपदा या फसल खराब होने की स्थिति में उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
FTA के खिलाफ भी आंदोलन की तैयारी
किसान संगठनों ने प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA को लेकर भी विरोध जताया है। उनका कहना है कि इस मुद्दे पर देशभर में आंदोलन की तैयारी की जा रही है।
किसानों के मुताबिक, ऐसे समझौतों का सीधा असर कृषि क्षेत्र और किसानों की आय पर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी फैसले से पहले किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
2 से 7 सितंबर तक बढ़ेगा दबाव?
किसान संगठनों का कहना है कि उनकी मांगें नई नहीं हैं। वे कई वर्षों से सरकार के सामने इन्हें रखते आ रहे हैं। अब सप्ताहभर के धरने के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
चंडीगढ़ बॉर्डर पर किसानों की मौजूदगी ने एक बार फिर MSP, जल अधिकार, कर्ज और कृषि सुरक्षा जैसे सवालों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार बातचीत और फैसले के जरिए आंदोलन को शांत करती है या किसान आने वाले दिनों में अपना आंदोलन और व्यापक करते हैं।
