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भोजशाला में एक रुपये के टिकट ने फिर भड़काया बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद

मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। इस बार मामला किसी धार्मिक आयोजन या सर्वे को लेकर नहीं बल्कि परिसर में प्रवेश के लिए लिए जा रहे एक रुपये के टिकट को लेकर गरमा गया है। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के जिलाध्यक्ष और भोजशाला मामले के याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई की इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब अदालत ने भोजशाला को मंदिर माना है तो फिर श्रद्धालुओं से प्रवेश शुल्क लेना पूरी तरह अनुचित है। इस मुद्दे के सामने आते ही एक बार फिर भोजशाला को लेकर राजनीतिक और धार्मिक बहस तेज हो गई है। स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों का कहना है कि यह केवल एक रुपये का मामला नहीं बल्कि आस्था और सम्मान का प्रश्न है। वहीं प्रशासन फिलहाल इस पूरे विवाद पर चुप नजर आ रहा है।

पुराने टिकट और बंद कमरे ने बढ़ाया विवाद

आशीष गोयल ने केवल टिकट शुल्क पर ही सवाल नहीं उठाए बल्कि पुराने टिकट प्रारूप को लेकर भी प्रशासन पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि आज भी भोजशाला में ऐसे टिकट जारी किए जा रहे हैं जिन पर ‘भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद’ लिखा हुआ है। हालांकि बाद में ‘कमाल मौला मस्जिद’ शब्दों को स्केच पेन से काट दिया जाता है। गोयल का कहना है कि अदालत के फैसले के बाद भी यदि पुराने प्रारूप का इस्तेमाल जारी है तो यह प्रशासनिक लापरवाही और आदेशों की अनदेखी को दर्शाता है। इसके अलावा परिसर के अंदर स्थित एक बंद कमरे को लेकर भी नया विवाद खड़ा हो गया है। दावा किया जा रहा है कि यह हिस्सा गणपति मंदिर से जुड़ा हुआ है और एएसआई सर्वे के दौरान यहां द्वारपाल की मूर्तियां भी मिली थीं। हिंदू संगठनों की मांग है कि यदि भोजशाला को मंदिर माना गया है तो इस कमरे को श्रद्धालुओं के लिए खोला जाना चाहिए। इस मांग ने पूरे मामले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है।

भोजशाला में एक रुपये के टिकट ने फिर भड़काया बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद

94 अवशेषों और वैज्ञानिक खुदाई की मांग ने बढ़ाई हलचल

भोजशाला परिसर में मिले पुरातात्विक अवशेष भी अब विवाद का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सर्वे के दौरान मिले 94 अवशेषों और मूर्तियों को व्यवस्थित तरीके से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा जाना चाहिए ताकि श्रद्धालु उन्हें करीब से देख सकें। फिलहाल कई अवशेष लोहे के स्टैंड पर रखे गए हैं लेकिन वहां लोगों की सीधी पहुंच नहीं है। दूसरी तरफ एक अन्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और एएसआई को आवेदन देकर परिसर में वैज्ञानिक खुदाई कराने की मांग कर दी है। उनका दावा है कि स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जमीन के नीचे भगवान हनुमान समेत कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां दबे होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि यदि खुदाई होती है तो कई ऐतिहासिक और धार्मिक तथ्य सामने आ सकते हैं। इस मांग के बाद प्रशासनिक हलकों में भी हलचल बढ़ गई है क्योंकि मामला अब केवल टिकट विवाद तक सीमित नहीं रह गया बल्कि ऐतिहासिक और धार्मिक दावों तक पहुंच गया है।

अदालत के फैसले के बाद भी क्यों नहीं थम रहा विवाद

भोजशाला को लेकर पिछले कई वर्षों से विवाद चलता आ रहा है और अदालत के फैसलों के बाद भी यह मामला शांत होता नजर नहीं आ रहा। अब एक रुपये के टिकट से शुरू हुई बहस ने फिर से धार्मिक संगठनों और प्रशासन को आमने सामने ला दिया है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यदि यह मंदिर है तो यहां किसी प्रकार का शुल्क नहीं होना चाहिए और व्यवस्थाओं में तुरंत बदलाव किए जाने चाहिए। दूसरी तरफ प्रशासन और एएसआई अभी तक इस विवाद पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दे पाए हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है क्योंकि इसमें धार्मिक भावनाएं और ऐतिहासिक दावे दोनों जुड़े हुए हैं। वैज्ञानिक खुदाई की मांग और बंद कमरों को खोलने की अपील ने मामले को और पेचीदा बना दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि एएसआई और सरकार आगे क्या फैसला लेते हैं और क्या भोजशाला विवाद का कोई स्थायी समाधान निकल पाएगा या फिर यह बहस आने वाले समय में और ज्यादा गहराएगी।

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