
बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। एनडीए खेमे में उम्मीदवारों के नामों पर मंथन चल रहा है और माना जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया जा सकता है। निशांत कुमार ने हाल ही में 8 मार्च 2026 को जदयू की सदस्यता ली थी और उसके बाद उन्हें बिहार सरकार में मंत्री बनाया गया था। मुख्यमंत्री के पुत्र होने के कारण उनका नाम राजनीतिक रूप से काफी चर्चा में है और इस फैसले को एनडीए की रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
दीपक प्रकाश को भी मिल सकता है मौका, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे पर नजर
एनडीए के भीतर दूसरे संभावित नाम के रूप में मंत्री दीपक प्रकाश की चर्चा भी तेज है, जिन्हें विधान परिषद भेजा जा सकता है। दीपक प्रकाश राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं और वे भी फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई है। अब संभावना जताई जा रही है कि उन्हें भी एमएलसी उम्मीदवार बनाया जा सकता है। एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर बातचीत जारी है और LJP (रामविलास) के खाते में भी एक सीट जाने की चर्चा है, जिससे गठबंधन में संतुलन साधने की कोशिश की जा रही है।

28 जून को खाली हो रही 9 सीटें, कई दिग्गजों का कार्यकाल समाप्त
बिहार विधान परिषद में बड़ा बदलाव 28 जून को देखने को मिलेगा, जब कुल 9 सीटें खाली हो रही हैं। बीजेपी की ओर से सम्राट चौधरी के इस्तीफे के कारण एक सीट पहले से खाली है, जबकि संजय प्रकाश का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। जदयू से भगवान सिंह कुशवाहा के इस्तीफे के बाद भी एक सीट खाली है। इसके अलावा कुमुद वर्मा, गुलाम गौस और भीष्म सहनी का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। राजद के सुनील सिंह और मोहम्मद फारुक तथा कांग्रेस के समीर सिंह की सीटें भी समाप्त हो रही हैं, जिससे राजनीतिक समीकरण बदलने की पूरी संभावना बन गई है।
उपचुनाव और जातीय संतुलन पर टिकी नजरें, जल्द हो सकता है चुनाव का ऐलान
इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री निशांत कुमार की सीट पर भी उपचुनाव होना तय है क्योंकि उन्होंने 30 मार्च को एमएलसी पद से इस्तीफा दे दिया था, जबकि उनका कार्यकाल 2030 तक था। अब जल्द ही चुनाव की तारीखों का ऐलान हो सकता है और राजनीतिक दल जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार तय करेंगे। एनडीए और महागठबंधन दोनों ही इस चुनाव को काफी गंभीरता से ले रहे हैं, क्योंकि यह चुनाव राज्यसभा और विधानसभा दोनों स्तर पर राजनीतिक ताकत का संकेत देने वाला माना जा रहा है।