
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री आवास परिसर अब केवल प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि इसे प्रकृति के जीवंत संग्रहालय के रूप में विकसित करने की बड़ी पहल शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर 60 एकड़ में फैले इस परिसर को “थ्री-बी गार्डन” यानी बी, बर्ड और बटरफ्लाई थीम पर तैयार किया जाएगा। इस अनोखे प्रोजेक्ट का मकसद ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां मधुमक्खियां, पक्षी और तितलियां एक साथ पनप सकें। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगी बल्कि सरकारी परिसरों के उपयोग का एक नया मॉडल भी पेश करेगी।
शहद उत्पादन से शुरू हुई नई सोच
इस परियोजना की शुरुआत एक साधारण प्रयोग से हुई, जब तीन साल पहले यहां मधुमक्खी पालन शुरू किया गया। शुरुआती दौर में कुछ मौनबाक्स से ही 40 से 50 किलोग्राम शहद उत्पादन हुआ, जिसने इस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। धीरे-धीरे मौनबाक्स की संख्या बढ़ाई गई और पिछले वर्ष करीब 150 किलोग्राम शहद प्राप्त हुआ। इस साल तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला रहा, जब केवल 45 दिनों में 520 किलोग्राम शहद का उत्पादन हुआ। इस सफलता ने मुख्यमंत्री को प्रेरित किया कि इस उद्यान को और व्यापक रूप में विकसित किया जाए, जिससे प्रकृति के अन्य जीव भी इसमें शामिल हो सकें।

थ्री-बी गार्डन की खास योजना और डिजाइन
उद्यान विभाग इस पूरे प्रोजेक्ट को वैज्ञानिक और योजनाबद्ध तरीके से तैयार कर रहा है। इसके तहत 12 महीनों का एक विशेष कैलेंडर बनाया जा रहा है, जिसमें हर मौसम के अनुसार ऐसे पौधों का चयन किया जाएगा जो सालभर फूल देते रहें। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पूरे साल मधुमक्खियों के लिए पराग उपलब्ध रहे और तितलियां व पक्षी भी आकर्षित हों। करीब ढाई किलोमीटर के क्षेत्र में पौधारोपण किया जाएगा, जिसमें मुख्यमंत्री आवास के साथ आसपास के क्षेत्रों को भी शामिल किया जाएगा। इससे न केवल शहद उत्पादन में निरंतरता बनी रहेगी बल्कि जैव विविधता को भी मजबूती मिलेगी।
पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
थ्री-बी गार्डन की यह पहल उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन को भी नई दिशा दे सकती है। इस तरह का मॉडल यदि सफल होता है तो इसे अन्य सरकारी परिसरों और शहरों में भी लागू किया जा सकता है। यह गार्डन न केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा बल्कि लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक भी करेगा। साथ ही, यह पहल यह संदेश देती है कि विकास और प्रकृति संरक्षण एक साथ चल सकते हैं, बशर्ते योजनाएं सही दिशा में बनाई जाएं।