हेरिटेज का दर्जा मिला, लेकिन नदी बनी बदबूदार नाला! सरस्वती नदी की हालत देख ग्रामीणों में नाराजगी

सरकार ने जिस पौराणिक सरस्वती नदी को हेरिटेज नदी का दर्जा देकर संरक्षण और सौंदर्यीकरण का सपना दिखाया था, आज उसी नदी की हालत लोगों को निराश कर रही है। गांव पोलड से गुजरने वाली यह ऐतिहासिक नदी जलकुंभी, गंदगी और तेज दुर्गंध से घिर चुकी है। हालात ऐसे हैं कि श्रद्धालु अब यहां स्नान करने से भी बचने लगे हैं और ग्रामीणों का जीवन भी प्रभावित हो रहा है।
रिवर फ्रंट परियोजना भी नहीं बदल सकी तस्वीर
सरस्वती नदी के संरक्षण और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यहां रिवर फ्रंट परियोजना शुरू की गई थी। स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि इससे नदी का स्वरूप बदलेगा और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ेगी। लेकिन आज भी नदी का अधिकांश हिस्सा जलकुंभी से ढका है और सफाई के अभाव में परियोजना का लाभ धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा।

धार्मिक आस्था पर भी पड़ा असर
नदी के किनारे स्थित प्राचीन सरस्वती मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। यहां यज्ञ, मेले और धार्मिक आयोजन होते हैं। पहले श्रद्धालु नदी में स्नान कर पूजा-अर्चना करते थे, लेकिन अब गंदे और बदबूदार पानी के कारण लोग घाटों से दूरी बना रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इससे क्षेत्र की धार्मिक पहचान भी प्रभावित हो रही है।
जलकुंभी बनी खतरा, सांप-बिच्छुओं का बढ़ा आतंक
ग्रामीण जगरूप सिंह के अनुसार, नदी में फैली जलकुंभी और झाड़ियों ने जहरीले सांप, बिच्छू और अन्य जीवों का ठिकाना बना दिया है। कई बार ये जीव घरों तक पहुंच जाते हैं, जिससे छोटे बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती है। वहीं तेज दुर्गंध के कारण लोगों का घरों के बाहर बैठना और भोजन करना भी मुश्किल हो गया है।
ग्रामीणों ने उठाई नियमित सफाई की मांग
पूर्व सरपंच श्रवण कुमार और स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले नदी में औद्योगिक इकाइयों का रासायनिक पानी भी आता था, जिसे ग्रामीणों के प्रयासों से काफी हद तक रोका गया। इसके बावजूद नियमित सफाई और रखरखाव न होने से नदी की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। लोगों ने प्रशासन से जलकुंभी हटाने, घाटों की सफाई कराने और रिवर फ्रंट परियोजना को प्रभावी ढंग से पूरा करने की मांग की है।
सरस्वती नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हेरिटेज का दर्जा केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। नियमित सफाई, प्रभावी रखरखाव और जनभागीदारी ही इस नदी को उसकी खोई पहचान वापस दिला सकती है।
