करोड़ों की कमाई, नियमों की अनदेखी और छात्रों की सुरक्षा पर सवाल

दिल्ली-NCR में छात्रों और नौकरी की तलाश में आने वाले युवाओं की बढ़ती संख्या के साथ पेइंग गेस्ट यानी PG का कारोबार तेजी से विस्तार कर रहा है। शिक्षण संस्थानों, कोचिंग हब और रोजगार केंद्रों के आसपास बड़ी संख्या में मकानों को PG में बदल दिया गया है।
लेकिन इस कारोबार के विस्तार के साथ सुविधाओं, किराये की पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ संचालक भारी किराया वसूलने के बावजूद उसके अनुरूप सुविधाएं नहीं देते।
15 से 20 हजार करोड़ तक के कारोबार का दावा
जानकारों के हवाले से राजधानी में PG कारोबार का आकार करीब 15 से 20 हजार करोड़ रुपये तक होने का दावा किया जाता है। हालांकि, इस क्षेत्र की वास्तविक आय का कितना हिस्सा आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है, इसका स्पष्ट और एकीकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
आरोप है कि कुछ संपत्ति मालिक और PG संचालक किराये का भुगतान नकद में लेते हैं। इससे लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड तैयार नहीं होता और वास्तविक आय छिपाने की आशंका पैदा होती है।
10-12 कमरों के PG से लाखों की कमाई
PG कारोबार की कमाई का अंदाजा किराये के मौजूदा ढांचे से लगाया जा सकता है। 10 से 12 कमरों वाले सामान्य PG में एक कमरे में दो से चार लोगों को रखने के मामले सामने आते हैं। प्रत्येक व्यक्ति से करीब 10 से 15 हजार रुपये मासिक किराया लिया जाने की बात कही जाती है।

इस गणित के आधार पर छोटे भवन से भी हर महीने कई लाख रुपये का कारोबार संभव है। बड़े PG या एक ही संचालक के कई भवनों में कारोबार होने पर यह रकम काफी बढ़ सकती है।
मुखर्जी नगर से दक्षिण दिल्ली तक फैला नेटवर्क
दिल्ली के मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर, किंग्सवे कैंप और दक्षिण दिल्ली के कई इलाकों में PG की बड़ी संख्या बताई जाती है। खासकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए ये इलाके प्रमुख आवासीय केंद्र बन चुके हैं।
छात्रों की लगातार मांग के कारण मकान मालिकों के लिए सामान्य किराये की तुलना में PG मॉडल अधिक कमाई वाला विकल्प बन गया है।
नकद किराये से टैक्स व्यवस्था पर सवाल
PG कारोबार में नकद लेनदेन को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में वास्तविक किराये की तुलना में कम रकम कागजों पर दिखाई जाती है या औपचारिक किरायानामा ही नहीं बनाया जाता।
ऐसे मामलों में वास्तविक आय और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आय के बीच अंतर की आशंका रहती है। हालांकि, किसी व्यक्ति या संचालक द्वारा टैक्स चोरी की पुष्टि संबंधित विभाग की जांच और दस्तावेजों के आधार पर ही की जा सकती है।
लाइसेंस और फायर सेफ्टी सबसे बड़ा मुद्दा
PG में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। आरोप है कि कुछ भवन बिना जरूरी ट्रेड लाइसेंस, फायर सेफ्टी व्यवस्था और अन्य आवश्यक अनुमतियों के संचालित हो रहे हैं।
जर्जर इमारतों में बड़ी संख्या में लोगों को ठहराना आग, भगदड़ या किसी अन्य आपात स्थिति में गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। ऐसे में सिर्फ किराये और सुविधाओं की नहीं, बल्कि भवन की संरचनात्मक सुरक्षा और आपातकालीन निकासी व्यवस्था की भी जांच जरूरी है।
छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाने का आरोप
दिल्ली आने वाले छात्रों के सामने किफायती और सुविधाजनक आवास की तलाश बड़ी चुनौती होती है। इसी मजबूरी के बीच कुछ PG संचालकों पर मनमाना किराया वसूलने और पर्याप्त सुविधाएं नहीं देने के आरोप लगते हैं।
कई किरायेदारों को भुगतान की औपचारिक रसीद या स्पष्ट किरायानामा नहीं मिलने की शिकायत भी सामने आती है। इससे विवाद होने पर छात्रों के लिए अपने अधिकार साबित करना मुश्किल हो सकता है।
सत्य निकेतन का मामला भी सवालों के घेरे में
सत्य निकेतन की एक इमारत का मामला इस पूरे कारोबार की चुनौतियों को समझने का उदाहरण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बिल्डिंग मालिक हरिराम गुप्ता ने जर्जर भवन को पिछले साल अगस्त में भजनपुरा निवासी सुधांशु लवनीश और सुभम त्यागी को लीज पर दिया था।
बताया गया कि जर्जर हालत के कारण भवन सामान्य किराये पर नहीं उठ रहा था। इसके बाद करीब एक लाख रुपये के किराये पर चार मंजिल लीज पर लेकर उसमें रंग-रोगन कराया गया और PG शुरू किया गया।
यह मामला यह सवाल उठाता है कि किसी पुराने या जर्जर भवन को PG में बदलने से पहले उसकी संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़ी जरूरी मंजूरियों की जांच किस स्तर पर हुई।
निगरानी मजबूत हुई तो बढ़ सकता है सरकारी राजस्व
PG सेक्टर की व्यवस्थित ऑडिटिंग, डिजिटल किराया रिकॉर्ड, अनिवार्य पंजीकरण और नियमित सुरक्षा निरीक्षण से कई समस्याओं पर लगाम लगाई जा सकती है। इससे एक तरफ छात्रों की सुरक्षा बेहतर हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक कारोबार का रिकॉर्ड सामने आने से सरकारी राजस्व भी बढ़ सकता है।
दिल्ली-NCR में PG की मांग लगातार बनी रहने की संभावना है। ऐसे में चुनौती इस कारोबार को रोकने की नहीं, बल्कि इसे पारदर्शी, सुरक्षित और नियमों के दायरे में लाने की है। छात्रों के लिए छत जरूरी है, लेकिन वह छत सुरक्षित और जवाबदेह व्यवस्था के साथ मिले, यह उससे भी ज्यादा जरूरी है।