
BRICS Summit 2026 ने जहां दिल्ली को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रखा, वहीं इसका असर उत्तर प्रदेश तक भी दिखाई दिया। समिट से पहले रूस के तीन सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर पर उतरे।
बताया गया कि इन विमानों से रूस की एडवांस टीम और सुरक्षा से जुड़े अधिकारी पहुंचे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह जेवर एयरपोर्ट पर किसी विदेशी विमान की पहली लैंडिंग थी। महज कुछ महीने पुराने एयरपोर्ट के लिए यह एक महत्वपूर्ण ऑपरेशनल टेस्ट माना जा रहा है।
कुछ महीने पहले शुरू हुआ ऑपरेशन
जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन मार्च 2026 में हुआ था। शुरुआत में इसकी सालाना करीब 1.2 करोड़ यात्रियों को संभालने की क्षमता बताई गई है। फिलहाल यहां घरेलू उड़ानों का संचालन हो रहा है।
ऐसे में रूसी सैन्य विमानों का उतरना खास इसलिए भी है क्योंकि एयरपोर्ट ने नियमित अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानें शुरू होने से पहले ही बड़े स्तर की डिप्लोमैटिक और सुरक्षा से जुड़ी उड़ानों को संभालने की क्षमता प्रदर्शित की है।
हालांकि, इसे पूरी तरह कमर्शियल इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। नियमित अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों की शुरुआत अभी बाकी है।

BRICS के लिए जेवर क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं और भारत की अध्यक्षता में इस वर्ष सप्लाई चेन, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और दवा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर है।
इसी संदर्भ में जेवर की अहमियत सिर्फ यात्रियों की आवाजाही तक सीमित नहीं है। एयरपोर्ट के आसपास YEIDA क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों को तेजी से विकसित किया जा रहा है। कार्गो, सेमीकंडक्टर, मेडिकल डिवाइस और एविएशन सेक्टर से जुड़ी परियोजनाएं इस क्षेत्र को अलग पहचान दे सकती हैं।
22 हजार वर्ग मीटर का कार्गो वेयरहाउस
जेवर एयरपोर्ट के कार्गो टर्मिनल में करीब 22 हजार वर्ग मीटर का वेयरहाउस बताया गया है। शुरुआती स्तर पर यहां हर साल करीब 2 लाख टन माल संभालने की क्षमता होने की बात कही गई है।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में जेवर से सिर्फ यात्री ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप, मेडिकल उपकरण, कलपुर्जे और दूसरी हाई-वैल्यू वस्तुओं की आवाजाही भी बढ़ सकती है।
यही कार्गो क्षमता जेवर को उत्तर भारत की सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका दिला सकती है।
सेमीकंडक्टर और मेडटेक से बदल रहा इलाका
जेवर के आसपास के YEIDA क्षेत्र में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। HCL-Foxconn का करीब 3,700 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट डिस्प्ले ड्राइवर चिप निर्माण की दिशा में काम कर रहा है।
इसके अलावा एयरपोर्ट के पास करीब 350 एकड़ में मेडटेक हब विकसित किए जाने की योजना है। इसका उद्देश्य मेडिकल उपकरण निर्माण से जुड़ी कंपनियों के लिए औद्योगिक आधार तैयार करना है।
एविएशन सेक्टर में MRO यानी मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल सुविधाओं का विकास भी प्रस्तावित है। यानी एयरपोर्ट के आसपास धीरे-धीरे यात्री हवाई अड्डे से कहीं बड़ा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम आकार ले रहा है।
सबसे बड़ी चुनौती- कनेक्टिविटी
जेवर के सामने हालांकि एक बड़ी चुनौती भी है और वह है कनेक्टिविटी। दिल्ली के मध्य हिस्सों से जेवर पहुंचने में मौजूदा IGI एयरपोर्ट की तुलना में ज्यादा समय लग सकता है।
शुरुआती दौर में यात्रियों की संख्या और उड़ानों से जुड़ी चुनौतियां भी एयरपोर्ट के सामने रहेंगी। इसलिए जेवर की सफलता केवल रनवे और टर्मिनल की क्षमता पर निर्भर नहीं करेगी। सड़क, एक्सप्रेसवे और दूसरे परिवहन नेटवर्क से मजबूत कनेक्शन बेहद जरूरी होगा।
3,630 करोड़ के ग्रीनफील्ड कॉरिडोर से उम्मीद
इस चुनौती को दूर करने की दिशा में केंद्र सरकार ने करीब 3,630 करोड़ रुपये की लागत वाले ग्रीनफील्ड कॉरिडोर को मंजूरी दी है। करीब 31 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर जेवर को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से जोड़ने की योजना का हिस्सा है।
इसके जरिए एयरपोर्ट को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से बेहतर कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है।
अगर ये कनेक्शन समय पर और प्रभावी तरीके से विकसित होते हैं तो जेवर सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एयरपोर्ट नहीं रहेगा। यह पूरे दिल्ली-NCR के लिए बड़ा एयर ट्रांसपोर्ट और कार्गो हब बन सकता है।
रूसी विमानों की लैंडिंग सिर्फ शुरुआत?
BRICS Summit के दौरान रूसी विमानों की लैंडिंग को जेवर के बदलते महत्व की शुरुआती झलक माना जा सकता है। एयरपोर्ट अभी नियमित कमर्शियल इंटरनेशनल पैसेंजर हब बनने की प्रक्रिया में है, लेकिन इसके आसपास एयर कार्गो, सेमीकंडक्टर, मेडिकल डिवाइस और एविएशन सेक्टर का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
असल कहानी सिर्फ एक नए एयरपोर्ट की नहीं है। सवाल यह है कि क्या जेवर के आसपास विकसित हो रही इंडस्ट्री और मजबूत होती कनेक्टिविटी मिलकर इसे उत्तर भारत की सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बना पाएगी।
अगर रनवे के साथ इंडस्ट्री और कनेक्टिविटी भी उसी रफ्तार से जमीन पर उतरती है, तो आने वाले वर्षों में जेवर उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे दिल्ली-NCR की आर्थिक तस्वीर बदलने वाले प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल हो सकता है।