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बजट 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कैसे तय करेंगी योजना के लिए फंडिंग?

हर साल 1 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण देश का बजट पेश करती हैं। यह उनके लिए लगातार नौवां बजट होगा। बजट की तैयारी जनवरी में अचानक शुरू नहीं होती, बल्कि इसका काम लगभग छह महीने पहले यानी सितंबर या अक्टूबर से ही शुरू हो जाता है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की ओर से सभी मंत्रालयों और विभागों को एक बजट सर्कुलर जारी किया जाता है। इसके तहत हर मंत्रालय अपनी चल रही योजनाओं, आने वाली जिम्मेदारियों और नई पहलों का विस्तृत व्यय अनुमान तैयार करता है। ये आंकड़े बजट की अंतिम योजना बनाने के लिए आधार बनते हैं। इस प्रक्रिया में हर मंत्रालय अपने-अपने क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सही अनुमान प्रस्तुत करता है ताकि फंडिंग में न्याय हो सके।

बजट आवंटन के चार मुख्य स्तंभ

सरकार का बजट आवंटन सिर्फ मंत्रालयों की मांग पर निर्भर नहीं करता। इसके लिए वित्त मंत्रालय चार तकनीकी मानदंडों का इस्तेमाल करता है। पहला है पूंजीगत व्यय और राजस्व व्यय के बीच संतुलन बनाना। सरकार पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता देती है क्योंकि यह दीर्घकालिक संपत्ति बनाता है और देश के विकास को बढ़ावा देता है, जबकि राजस्व व्यय अधिकतर वेतन और रखरखाव में जाता है। दूसरा मानदंड नॉमिनल जीडीपी अनुमान है, जिसके आधार पर सभी बजट आंकड़े जीडीपी के प्रतिशत के रूप में तय होते हैं। इसमें वास्तविक विकास दर के साथ महंगाई का भी ध्यान रखा जाता है। तीसरा, राजकोषीय घाटे का लक्ष्य निर्धारित करना होता है ताकि सरकार अपनी आय से अधिक खर्च सीमित रख सके। चौथा और अंतिम कारक पिछला प्रदर्शन होता है। वे योजनाएं जिनके पिछले बजट का सही उपयोग हुआ हो और मापने योग्य परिणाम मिले हों, उन्हें अधिक फंडिंग मिलती है।

असली बजट गणित और अनिवार्य खर्च

जब कुल अनुमानित राजस्व का आंकड़ा तय हो जाता है, तो सरकार इसे 100 पैसे के रूप में मानती है जिसे बांटना होता है। इस राशि का बड़ा हिस्सा पहले से तय अनिवार्य खर्चों में लगा दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, केवल ब्याज भुगतान ही कुल खर्च का लगभग 20% हिस्सा लेता है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को केंद्रीय करों का हिस्सा लगभग 22% देना होता है। रक्षा खर्च भी लगभग 8% तक होता है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन जैसे गैर-समझौते योग्य खर्च भी बजट का एक बड़ा हिस्सा लेते हैं। इन जरूरी खर्चों को निकालने के बाद ही सरकार तय करती है कि विकास योजनाओं के लिए कितना पैसा बचा है। यही असली बजट गणित है जो फंड के आवंटन को दिशा देता है।

स्कीमों का फंडिंग और बजट का अंतिम रूप

विकास योजनाओं के लिए बचा हुआ पैसा केंद्र सरकार की दो मुख्य श्रेणियों – केंद्रीय क्षेत्रीय योजनाएं और केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं – में बांटा जाता है। यह खर्च आमतौर पर 60:40 या 50:50 के अनुपात में राज्यों के साथ साझा किया जाता है। इस फंडिंग की प्रतियोगिता इंफ्रास्ट्रक्चर, वेलफेयर, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होती है। बजट फाइनल करने से पहले वित्त मंत्रालय हर मंत्रालय से मीटिंग करता है ताकि उनकी मांगों को फाइनेंशियल लिमिट में रखा जा सके। अंतिम बजट प्रधानमंत्री और केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद संसद में अनुदान मांगों के रूप में पेश किया जाता है। संसद के सदस्यों के वोटिंग के बाद ही यह पैसा खर्च किया जा सकता है। इस तरह सरकार देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करती है और विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाती है।

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