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सुप्रीम कोर्ट ने झटपट खारिज की न्यायिक सुधारों की याचिका, CJI ने लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने एक याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें न्यायिक सुधारों के लिए समिति बनाने, हर मामले को 12 महीनों के भीतर निपटाने और कुछ मामलों की जांच कराने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस ने इस याचिका को “प्रचार की होड़” बताया और स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों के साथ कोर्ट का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। उन्होंने याचिकाकर्ता को कड़क लहजे में कहा, “हम किसी को भी ‘न्यायिक सुधार’ के नाम पर यहाँ नहीं आने देंगे। अगर सुधार के सुझाव हैं तो पहले लिखित में दें… जो भी होगा, मुझे लिखकर भेजिए। फिर मैं देखूंगा कि संभव है या नहीं। हम सब यहाँ हैं, हम खुद ही करेंगे।”

याचिका की जगह पत्र भेजने का सुझाव

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता को सीधे संबोधित करते हुए कहा कि अगर देश में बदलाव लाना है तो ऐसे याचिका दायर करने की जरूरत नहीं है। बस एक पत्र लिखकर उन्हें भेज दें। उन्होंने जोर देकर कहा, “देश में बदलाव लाना चाहते हो? ऐसे याचिका दायर करने की कोई जरूरत नहीं… बस एक पत्र लिखो और भेज दो।” इसके अलावा उन्होंने यह भी जताया कि लोग केवल कैमरे के सामने बोलने के लिए ऐसी याचिकाएं दायर करते हैं। उन्होंने कड़ा संदेश दिया, “ऐसी याचिकाएं मत डालो सिर्फ कैमरों के सामने बोलने के लिए।”

याचिका में विभिन्न असंबंधित मुद्दों को जोड़ने की आलोचना

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि याचिका में कई अलग-अलग और असंबंधित मुद्दों को जोड़ा गया था, जो कि गलत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता चाहें तो प्रशासनिक सुधारों के सुझाव सीधे मुख्य न्यायाधीश को लिखित रूप में भेज सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “ऐसे सुझावों का हमेशा स्वागत है।” इस फैसले से यह साफ हुआ कि न्यायालय न्यायिक सुधारों के नाम पर अनावश्यक जन-ध्यान आकर्षित करने वाली याचिकाओं को गंभीरता से नहीं ले रहा।

हर मामले का 1 साल में निपटान मांग पर चीफ जस्टिस का तीखा जवाब

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि हर कोर्ट को हर मामले में 1 साल के भीतर फैसला सुनाना चाहिए। इस मांग पर चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने व्यंग्यात्मक अंदाज में प्रतिक्रिया दी और पूछा, “आप कह रहे हो कि हर कोर्ट को एक साल में फैसला देना चाहिए? कितने ऐसे कोर्ट चाहिए आपको?” इस सवाल से यह जाहिर हुआ कि कोर्ट को याचिकाकर्ता की मांगों को पूरा करना व्यावहारिक या संभव नहीं लगता। इस प्रकार कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं और विविधताओं को समझे बिना जल्दबाजी में नियम बनाना सही नहीं होगा।

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