स्मार्टवॉच से होगा शरीर में माइक्रोप्लास्टिक का पता नया रिसर्च चौंकाने वाला खुलासा

आज के समय में प्लास्टिक का उपयोग इतना अधिक बढ़ चुका है कि इसके बेहद छोटे कण यानी माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक अब हवा पानी और खाने पीने की चीजों में भी पाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये कण शरीर के अंदर प्रवेश कर खून के जरिए विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि इनका प्रभाव लंबे समय में स्वास्थ्य पर क्या पड़ेगा यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। समस्या यह भी है कि शरीर में इन कणों की मात्रा और उनकी मौजूदगी को मापना बेहद कठिन और जटिल प्रक्रिया है।
मौजूदा तकनीक और सीमाएं
अभी तक शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान के लिए ब्लड सैंपल और अत्याधुनिक लैब उपकरणों की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया न केवल महंगी है बल्कि इसमें काफी समय भी लगता है। इसी वजह से वैज्ञानिक अब तक यह सटीक रूप से नहीं समझ पाए हैं कि इंसान के शरीर में कितनी मात्रा में प्लास्टिक जमा हो रहा है और इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या हो सकता है। इस चुनौती को देखते हुए अब नई और आसान तकनीकों की आवश्यकता महसूस की जा रही है जो बिना जटिल परीक्षण के ही शरीर में प्लास्टिक कणों का पता लगा सके।

स्मार्टवॉच जैसी नई तकनीक पर शोध
University of Tartu के शोधकर्ता एक ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो दिखने में एक स्मार्टवॉच जैसी होगी और शरीर में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाने में सक्षम होगी। यह पहनने योग्य डिवाइस बिना किसी इनवेसिव टेस्ट के स्किन के जरिए ही जानकारी प्रदान कर सकेगा। इसमें स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का उपयोग किया जा रहा है जो विभिन्न पदार्थों पर पड़ने वाली रोशनी के व्यवहार का अध्ययन करती है। हर प्रकार का प्लास्टिक रोशनी को अलग तरीके से अवशोषित और परावर्तित करता है जिससे उसकी पहचान संभव हो पाती है। यह डिवाइस स्किन पर इंफ्रारेड और अल्ट्रावायलेट जैसी किरणें डालकर उनके रिफ्लेक्शन का विश्लेषण करेगा और उसी आधार पर प्लास्टिक कणों का पता लगाएगा।
भविष्य की संभावनाएं और स्वास्थ्य पर असर
शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शुरुआती परीक्षणों में इस तकनीक ने एआई स्किन के अंदर मौजूद प्लास्टिक कणों की सफल पहचान की है जो इसके भविष्य की संभावनाओं को मजबूत बनाता है। यदि यह तकनीक पूरी तरह विकसित और व्यावहारिक हो जाती है तो लोग स्मार्टवॉच रिंग या बैंड जैसे डिवाइस के जरिए अपने शरीर में माइक्रोप्लास्टिक के स्तर को आसानी से मॉनिटर कर सकेंगे। इससे न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य की निगरानी आसान होगी बल्कि वैज्ञानिकों को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि प्लास्टिक शरीर पर किस तरह असर डाल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक से सूजन कोशिकाओं पर दबाव और शरीर के सामान्य कार्यों में बाधा जैसी समस्याएं हो सकती हैं इसलिए समय रहते इसकी निगरानी बेहद जरूरी मानी जा रही है।
