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असम राजनीति में भूचाल, मियान वोट हटाने पर मुख्यमंत्री हिमंत सरमा का बयान

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के एक बयान ने राज्य और देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि जब राज्य में मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर किया जाएगा तब चार से पांच लाख मियां मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे। मुख्यमंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने यह भी कहा कि उनका काम उन्हें परेशान करना है। इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस बयान को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया है। वहीं सत्ताधारी दल के समर्थक इसे अवैध मतदाताओं के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं।

मुस्लिम वोटों पर टिप्पणी और विवाद

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने मीडिया से बातचीत के दौरान वोट चोरी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वे कुछ मियां वोट चुराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि आदर्श स्थिति में इन लोगों को असम में वोट देने की अनुमति नहीं होनी चाहिए और उन्हें बांग्लादेश में वोट देना चाहिए। इस बयान ने एक बड़े वर्ग को असहज कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की भाषा न सिर्फ भड़काऊ है बल्कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए शोभनीय भी नहीं है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस शुरू हो गई है। कई लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी खास समुदाय को निशाना बनाकर इस तरह की बात कह सकता है।

मियां शब्द और उसके मायने

असम में मियां शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर एक अपमानजनक संदर्भ में किया जाता है। यह शब्द खास तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन पर अवैध रूप से बांग्लादेश से आने का आरोप लगाया जाता है। हिमंता बिस्वा सरमा के बार बार इस शब्द के इस्तेमाल ने विवाद को और गहरा कर दिया है। जानकारों का कहना है कि यह मुद्दा सिर्फ वोटर लिस्ट से नाम हटाने तक सीमित नहीं है बल्कि भाषा और पहचान की राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि सरकार ने ऐसे इंतजाम कर लिए हैं जिससे ये लोग असम में वोट न कर सकें और यह तो सिर्फ शुरुआत है। उनके मुताबिक एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाएंगे।

SIR को लेकर स्थिति और चुनाव आयोग की भूमिका

हालांकि एक अहम तथ्य यह भी है कि असम उन बारह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल नहीं है जहां चुनाव आयोग इस समय स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन करा रहा है। चुनाव आयोग ने असम में मतदाता सूची का एक अलग विशेष संशोधन शुरू किया है जो सामान्य तौर पर होने वाले नियमित अपडेट जैसा ही है। ऐसे में मुख्यमंत्री के बयान और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि इस तरह के बयान समाज में डर का माहौल पैदा करते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं। वहीं चुनाव आयोग की जिम्मेदारी मानी जा रही है कि वह मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखे। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि वोटर लिस्ट का संशोधन कैसे हो और इसमें भाषा व बयानबाजी की सीमा क्या होनी चाहिए।

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