ओरुनोदोई योजना और पहचान की राजनीति क्या असम में फिर बनेगी BJP की जीत की वजह

असम में 126 विधानसभा सीटों के लिए मतदान गुरुवार 9 अप्रैल को होने जा रहा है। यह चुनाव राज्य की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें मुकाबला सीधे तौर पर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली बीजेपी गठबंधन और गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस के बीच है। बीजेपी तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ मैदान में है जबकि कांग्रेस एंटी इनकंबेंसी को भुनाकर वापसी की कोशिश कर रही है। 64 सीटों का बहुमत हासिल करना किसी भी दल के लिए सरकार बनाने की कुंजी है। लेकिन इस बार चुनाव केवल एक लहर पर नहीं बल्कि कई स्थानीय और सामाजिक मुद्दों पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि हर क्षेत्र का वोट और हर वर्ग का रुझान इस परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
डीलिमिटेशन और पहचान की राजनीति का प्रभाव
इस चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर 2023 का डीलिमिटेशन माना जा रहा है जिसने विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय किया है। इस प्रक्रिया में 2001 की जनगणना के आधार पर बदलाव किए गए और अल्पसंख्यक बहुल सीटों की संख्या घटकर लगभग 23 रह गई। इससे आदिवासी और स्थानीय समुदायों का प्रभाव बढ़ा है जो बीजेपी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। बराक वैली जैसे क्षेत्रों में सीटों के पुनर्गठन ने पारंपरिक वोट बैंक समीकरण को बदल दिया है। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और एनआरसी जैसे मुद्दे अब भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। बीजेपी इन मुद्दों को पहचान और सुरक्षा के एजेंडे के रूप में पेश कर रही है जबकि विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति बता रहा है।

वेलफेयर मॉडल और वोट बैंक की रणनीति
बीजेपी की चुनावी रणनीति मुख्य रूप से वेलफेयर योजनाओं और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर पर आधारित है। ओरुनोदोई योजना के तहत लाखों महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता दी जा रही है जिससे एक मजबूत लाभार्थी वर्ग तैयार हुआ है। इसके अलावा आत्मनिर्भर असम जैसी योजनाएं भी लोगों को आकर्षित करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन योजनाओं की लागत और राज्य पर बढ़ते कर्ज को मुद्दा बना रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अस्थायी लाभ देकर रोजगार और स्थायी विकास के मुद्दों से ध्यान भटका रही है। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक जैसे विवाद भी इस बहस को और तेज कर रहे हैं।
स्विंग वोट और विपक्ष की कमजोरी से तय होगा परिणाम
असम चुनाव में चाय बागान समुदाय और आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। राज्य की कई सीटों पर इन मतदाताओं का प्रभाव काफी गहरा है और दोनों प्रमुख दल इन क्षेत्रों में लगातार संपर्क अभियान चला रहे हैं। इसके अलावा बोडोलैंड क्षेत्र में सीटों की संख्या बढ़ने और शांति समझौतों के बाद बीजेपी को अपने सहयोगियों के साथ स्थिरता का फायदा मिलता दिख रहा है। हालांकि विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है और कांग्रेस एआईयूडीएफ राइजोर दल और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच वोट विभाजन बीजेपी के पक्ष में जा सकता है। 2021 में भी इसी विभाजन ने बीजेपी को 75 सीटों के साथ जीत दिलाई थी। अब देखना यह है कि क्या विपक्ष इस बार एकजुट होकर चुनौती पेश कर पाएगा या फिर सत्ता का समीकरण एक बार फिर मौजूदा गठबंधन के पक्ष में ही रहेगा।